शनिवार, १३ एप्रिल, २०२४

कविता –सावला रंग


बडा इतराता ये मन 

की सावला है ये तन 


निहारू जब दर्पण 

प्यार करू ईसे अर्पण 


डगोसे तो डरे वो गोरा रंग

पर ये सावला घुले सबके संग 


गोरे तो थे पहलेसेही फरेबी 

तब सावलोने मिटायी गरीबी 


किसीसे पुछो अपणी राय 

क्या लेंगे ? दूध या चाय 

तो बोले, बस..! एक कप सावली चाय !



शब्दस्नेह – समिक्षा काळणे

कविता –सावला रंग

बडा इतराता ये मन  की सावला है ये तन  निहारू जब दर्पण  प्यार करू ईसे अर्पण  डगोसे तो डरे वो गोरा रंग पर ये सावला घुले सबके संग  गोरे तो थे पह...